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Thursday, April 6, 2023
पुस्तकोपहार
Monday, January 24, 2022
सुभाष चन्द्र बोस (बांग्ला: সুভাষ চন্দ্র বসু उच्चारण: शुभाष चॉन्द्रो बोशु, जन्म: 23 जनवरी 1897, मृत्यु: 18 अगस्त 1945) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था[1]। उनके द्वारा दिया गया जय हिंद का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूँगा" का नारा भी उनका था जो उस समय अत्यधिक प्रचलन में आया।[2]भारतवासी उन्हें नेता जी के नाम से सम्बोधित करते हैं।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से सहायता लेने का प्रयास किया था, तो ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों को 1941 में उन्हें खत्म करने का आदेश दिया था।[3]
नेता जी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डर' के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए "दिल्ली चलो!" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इंफाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।
21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देशो की सरकारों ने मान्यता दी थी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।
1944 को आज़ाद हिंद फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यही एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।
6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिये उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगीं।[4]
नेताजी की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद है।[5] जहाँ जापान में प्रतिवर्ष 18 अगस्त को उनका शहीद दिवस धूमधाम से मनाया जाता है वहीं भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष की मौत 1945 में नहीं हुई। वे उसके बाद रूस में नज़रबन्द थे। यदि ऐसा नहीं है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से संबंधित (सम्बन्धित) दस्तावेज अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किये?(यथा संभव (सम्भव) नेता जी की मौत नहीं हुई थी) [6]
16 जनवरी 2014 (गुरुवार) को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नेता जी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की माँग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के लिये विशेष पीठ के गठन का आदेश दिया।[7]
आज़ाद हिन्द सरकार के 75 वर्ष पूर्ण होने पर इतिहास में पहली बार वर्ष 2018 में भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। 23 जनवरी 2021 को नेताजी की 125वीं जयन्ती है जिसे भारत सरकार ने पराक्रम दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।
Thursday, January 13, 2022
Swami Vivekanand
स्वामी विवेकानन्द (बांग्ला: স্বামী বিবেকানন্দ) (जन्म: 12 जनवरी 1863 - मृत्यु: 4 जुलाई 1902) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें 2 मिनट का समय दिया गया था लेकिन उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत "मेरे अमेरिकी बहनों एवं भाइयों" के साथ करने के लिये जाना जाता है।[4] उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।
कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली कायस्थपरिवार में जन्मे विवेकानन्द आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीवो मे स्वयं परमात्मा का ही अस्तित्व हैं; इसलिए मानव जाति अथेअथ जो मनुष्य दूसरे जरूरतमन्दो मदद करता है या सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानन्द ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का प्रत्यक्ष ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए प्रस्थान किया। विवेकानन्द ने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धान्तों का प्रसार किया और कई सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में विवेकानन्द को एक देशभक्त सन्यासी के रूप में माना जाता है और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।[5]
Sunday, October 31, 2021
वल्लभ भाई पटेल
Sunday, August 29, 2021
Monday, August 16, 2021
सुभद्रा कुमारी चौहान (१६ अगस्त १९०४-१५ फरवरी १९४८) हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं। उनके दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उनकी प्रसिद्धि झाँसी की रानी (कविता) के कारण है। ये राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रही हैं, किन्तु इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को कहानी में भी व्यक्त किया। वातावरण चित्रण-प्रधान शैली की भाषा सरल तथा काव्यात्मक है, इस कारण इनकी रचना की सादगी हृदयग्राही है।Thursday, August 12, 2021
Saturday, July 31, 2021
Munshi Premchand Birth Anniversary 2021
नाम – धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ़ नवाब राय उर्फ़ मुंशी प्रेमचंद
पिता का नाम – अजीब राय
माता का नाम – आनंदी देवी
पत्नी – शिवरानी देवी
व्यवसाय – अध्यापक, लेखक, पत्रकार
जन्म स्थान – लमही, वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
जन्म तारीख – 31 जुलाई 1880
अवधि/काल – आधुनिक काल
उल्लेखनीय कार्य – गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, सेवासदन, निर्मला और मानसरोवर
मृत्यु – 8 अक्टूबर, 1936 वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
Sunday, July 18, 2021
Saturday, July 17, 2021
Saturday, May 1, 2021
1 मई: मजदूर दिवस के अलावा और क्या खास
एक मई का दिन इतिहास में मजदूर दिवस के तौर पर दर्ज है। दुनिया में मजदूर दिवस मनाने का चलन करीब 132 साल पुराना है। मजदूरों ने काम के घंटे तय करने की मांग को लेकर 1877 में आंदोलन शुरू किया, इस दौरान यह दुनिया के विभिन्न देशों में फैलने लगा। एक मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फ़ैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल हुए और वहीं से एक मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत हुई। देश दुनिया के इतिहास में एक मई की तारीख पर दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है...
1886: अमेरिका के शिकागो में कामगारों के लिए काम के घंटे तय करने को लेकर हड़ताल, मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत।
1897: स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।
1908: प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर बम कांड को अंजाम देने के बाद खुद को गोली मारी।
1914: कार निर्माता फोर्ड वह पहली कंपनी बनी जिसने अपने कर्मचारियों के लिए आठ घंटे काम करने का नियम लागू किया।
1923: भारत में मई दिवस मनाने की शुरुआत।
1956: जोनसा साल्क द्वारा विकसित पोलियो वैक्सीन जनता के लिए उपलब्ध कराई गई। ॉ
1960: महाराष्ट्र और गुजरात अलग अलग राज्य बने।
1972: देश की कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण।
2009: स्वीडन ने समलैंगिक विवाह को मंजूरी दी।
2011: अमेरिका पर 2001 के हमले के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान के ऐबटाबाद में मारे जाने की पुष्टि।
Wednesday, April 14, 2021
Ambedker Jayanti
भीमराव रामजी आम्बेडकर[a] (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956), डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर नाम से लोकप्रिय, भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे।[1] उन्होंने दलित बौद्ध आन्दोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था।[2] वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मन्त्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे।
Tuesday, March 23, 2021
शहीदी दिवस 23 मार्च
शहीद दिवस 2021: जानें 23 मार्च को ही क्यों मनाते हैं शहीद दिवस
भगत सिंह केवल 23 साल के थे जब उन्हें फांसी दी गई थी लेकिन उनके क्रांतिकारी विचार बहुत व्यापक थे. आजादी की लड़ाई से लेकर आजतक हर रैली, आंदोलन और प्रदर्शनों में बोले जाने वाला नारा इंकलाब जिंदाबाद पहली बार भगत सिंह ने ही बोला था.
भारत में शहीद दिवस (Martyrs' Day) 23 मार्च को मनाया जाता है. अंग्रेज़ हुकूमत ने 23 मार्च 1931 की मध्यरात्रि को भारत के तीन सपूतों- भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी पर लटका दिया था. इस बलिदान को याद करने के लिए इस दिन को (23 मार्च) देश भर में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है.
भगत सिंह केवल 23 साल के थे जब उन्हें फांसी दी गई थी लेकिन उनके क्रांतिकारी विचार बहुत व्यापक थे. आजादी की लड़ाई से लेकर आजतक हर रैली, आंदोलन और प्रदर्शनों में बोले जाने वाला नारा इंकलाब जिंदाबाद पहली बार भगत सिंह ने ही बोला था.
भगत सिंह मानते थे कि व्यक्ति को दबाकर उसके विचार नहीं दबाए जा सकते हैं. तीनों क्रांतिकारियों की इस शहादत को आज पूरा देश याद कर रहा है. ये तीनों ही भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं. शहीद दिवस के अवसर पर स्कूल-कॉलेज और दफ्तरों में वाद-विवाद, भाषण, कविता-पाठ और निबंध प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होता है.
शहीद दिवस 23 मार्च को ही क्यों मनाया जाता है?
अंग्रेजी हुकूमत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च को ही फांसी पर लटका दिया गया था. ये तीनों ही भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं. भारत के इन नवयुवकों ने महात्मा गांधी से अलग रास्ता अपनाया था लेकिन यह देश के कल्याण के लिए था. इतनी कम उम्र में इस बहादुरी के साथ देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले इन वीर सपूतों को श्रद्धांजलि देने हेतु ही 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है।
शहीद दिवस कैसे मनाया जाता है?
पूरा देश इस मौके पर शहीदों की कुर्बानी को याद करता है और उन्हें नमन करता है. देश के गणमान्य लोग एक साथ इकट्ठा होकर शहीदों की प्रतिमाओं पर फूल चढ़ाते हैं. वहीं, देश के सशस्त्र बल के जवान शहीदों को याद में सलामी देते हैं. इसके अतिरिक्त, स्कूल-कॉलेज में भी इस उपलक्ष्य में वाद-विवाद, भाषण, कविता-पाठ एवं निबंध प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होता है.।
इस दिन का महत्व
शहीद दिवस को मनाकर हम न केवल शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं बल्कि आज की पीढ़ी को उन शहीदों के जीवन और बलिदानों से परिचित भी कराते हैं. भगत सिंह ने देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया, वह युवकों के लिए हमेशा ही एक बहुत बड़ा आदर्श बना रहेगा.
Sunday, March 21, 2021
विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च
✅ विश्व गौरैया दिवस : 𝚆𝙾𝚁𝙻𝙳 𝚂𝙿𝙰𝚁𝚁𝙾𝚆 𝙳𝙰𝚈 🐦
आज विश्व गौरैया दिवस है। यह हर साल 20 मार्च को मनाया जाता है। गौरैया के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए साल 2010 में इस दिवस को मनाने की शुरुआत की गई थी। पिछले कुछ समय से गौरैया की संख्या में काफी कमी आई है।
विश्व गौरैया दिवस (World Sparrow Day) हर साल 20 मार्च को मनाया जाता है। विश्व के कई देशों में गौरैया पाई जाती है। यह दिवस लोगों में गौरेया के प्रति जागरुकता बढ़ाने और उसके संरक्षण के लिए मनाया जाता है। बढ़ते प्रदूषण सहित कई कारणों से गौरैया की संख्या में काफी कमी आई है और इनके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
📌 जानिये भारत में गौरेया की क्या है स्थिति :
प्रत्येक वर्ष 20 मार्च 2020 को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। इस पक्षी के बारे में जागरूकता बढ़ाने और इसके संरक्षण के लिए विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। गौरैया भारत में पाया जाने वाला एक सामान्य पक्षी है लेकिन इसे शहरी क्षेत्रों में विलुप्त होने के कगार पर पहुँचा दिया गया है।
"द नेचर फॉर सोसाइटी ऑफ इंडियन एनवायरनमेंट" के संयोजक मोहम्मद दिलावर ने गौरेया की जनसंख्या में तेजी से गिरावट को देखते हुए यह पहल शुरू की। पहला विश्व गौरैया दिवस 2010 में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मनाया गया था।
रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, मनुष्यों और गौरैया के बीच 11,000 साल पुराना संबंध है। अध्ययन में कहा गया है कि तीन अलग-अलग प्रजातियों - कुत्तों, घरेलू गौरैया और मनुष्यों में कृषि के माध्यम से समान अनुकूलन शुरू हुआ था।
⌛️ विश्व गौरैया दिवस का इतिहास :
विश्व गौरैया दिवस, नेचर फॉरएवर सोसाइटी ऑफ इंडिया के साथ-साथ फ्रांस की इकोसेज एक्शन फाउंडेशन की शुरू की गई एक पहल है। सोसाइटी की शुरुआत फेमस पर्यावरणविद् मोहम्मद दिलावर ने की थी। उन्हें 2008 में टाइम मैगजीन ने "हीरोज ऑफ एनवायरमेंट" में शामिल किया गया था। साल 2010 में पहली बार 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया गया। इसके बाद हर साल 20 मार्च को यह दिवस मनाया जाता है। इस दिवस पर गौरैया के संरक्षण के लिए काम करने वाले लोगों को गौरैया पुरस्कार से सम्मानित भी किया जाता है।
▪️ गौरैया से जुडे कुछ रोचक तथ्य :
गौरैया का वैज्ञानिक नाम पासर डोमेस्टिकस और सामान्य नाम हाउस स्पैरो है। इसकी ऊंचाई 16 सेंटीमीटर और विंगस्पैन 21 सेंटीमीटर होते हैं। गौरैया का वजन 25 से 40 ग्राम होता है। गौरैया अनाज और कीड़े खाकर जीवनयापन करती है। शहरों की तुलना में गांवों में रहना इसे ज्यादा पसंद है।
▪️ कम हो रही है गौरैया की संख्या :
गौरैया की संख्या लगातार कम होती जा रही है. एस स्टडी के अनुसार इसकी संख्या में 60 फीसदी तक कमी आई है। विश्व गौरैया दिवस मनाने का एक उद्देशय यह भी है कि हमारे युवा और प्रकृति के प्रति उत्साही लोगों को गौरैया से प्रेम करने और उनकी देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
▪️ भारत में गौरैया की स्थिति :
रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स के एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, पिछले 40 वर्षों में अन्य पक्षियों की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन भारत में गौरैया की संख्या में 60% की कमी आई है। दुनिया भर में गौरैया की 26 प्रजातियां हैं, जबकि उनमें से 5 भारत में पाई जाती हैं।वर्ष 2015 की पक्षी जनगणना के अनुसार, लखनऊ में केवल 5692 और पंजाब के कुछ क्षेत्रों में लगभग 775 गौरैया थीं। वर्ष 2017 में, तिरुवनंतपुरम में केवल 29 गौरैया की पहचान की गई थी।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि आंध्र प्रदेश में इसकी संख्या में 80% की कमी आई है। केरल, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में 20% तक की गिरावट देखी गई है।
▪️ पृष्ठभूमि :
विश्व गौरैया दिवस पहली बार 2010 में नेचर फॉरएवर सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद दिलावर के प्रयासों से मनाया गया था। तब से, यह दिवस प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य गौरैया के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता लाना है।
▪ गौरैया का महत्व :
पर्यावरण संतुलन में गौरैया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। गौरैया अपने बच्चों को अल्फ़ा और कैटवॉर्म नामक कीड़े खिलाती है। ये कीड़े फसलों के लिए बेहद खतरनाक होते हैं। वे फसलों की पत्तियों को मारकर नष्ट कर देते हैं। इसके अलावा, गौरैया मानसून के मौसम में दिखाई देने वाले कीड़े भी खाती है।
Sunday, February 28, 2021
National Science Day
February 28 is observed as National Science Day to mark the anniversary of India’s greatest discovery- ‘Raman effect’ and to recognise the contributions of scientists towards the development of the nation. On this day in 1928, India’s prominent scientist CV Raman invented the ‘Raman Effect,’ for which he won the Nobel prize in 1930. Today, the government of India felicitates scientists whose contribution played an eminent role in the field of science and innovation.






















